Thursday, December 27, 2018

भारत के ७ आचर्यजनक स्थल (7 wonder of india)

दुनिया में कई ऐसी जगह और चीजे है जो किसी चमत्कार से कम नहीं है. इतिहास में मनुष्यों के द्वारा बनाये गए दुनिया के चमत्कार लोगो को सोचने पर मजबूर कर देते है की आखिर इन्हें कैसे बनाया होगा क्योंकि प्राचीनकाल की तकनीक आज के मुकाबले इतनी विकसित नहीं थी. आज के समय की बात करे तो आज का मानव कुछ भी बना सकता है. क्योंकि आज हमारी तकनीक काफी विकसित हो गयी है लेकिन इतिहास में मानव के द्वारा बनाई गयी चीजे आज भी किसी अजूबे से कम नहीं है. आपने दुनिया के सात अजूबे के बारे में तो जरुर सुना होगा और चलो आज हम आपको भारत के ७ अजूबो के बारे में बताते है


1. स्वर्ण मंदिर (The Golden Temple) Punjab






पंजाब के अमृतसर में सिखों की भक्ति और आस्था का केंद्र धार्मिक गुरुद्वारा स्थित है। जिसे श्री हरमंदिर साहिब, श्री दरबार साहिब और विशेष रूप से स्वर्ण मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहां सभी धर्मों के लोग अपना सिर झुकाते हैं। स्वर्ण मंदिर की स्थापना 1574 में चौथे सिख गुरु रामदासजी ने की थी। पांचवे सिख गुरु अर्जुन ने हरमंदिर साहिब को डिज़ाइन किया। माना जाता है कि 19वीं शताब्दी में अफगान हमलावरों ने इस मंदिर को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। तब महाराजा रणजीत सिंह ने इसे दोबारा बनवाया था और सोने की परत से सजाया था। धार्मिक महत्वता होने के बावजूद भी स्वर्ण मंदिर के बारे में कुछ ऐसी बाते हैं, जिनसे कई लोग अनजान हैं।



यह मंदिर सफ़ेद मार्बल से बना हुआ है और जिसे असली सोने से ढका गया है। जिसके कारण इसे स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है। स्वर्ण मंदिर के निर्माण के लिए मुस्लिम शासक अकबर ने जमीन दान की थी। मंदिर की नींव सूफी संत साईं मियां मीर ने रखी थी। महाराजा रणजीत सिंह ने स्वर्ण मंदिर के निर्माण के लगभग 2 शताब्दी बाद यहां की दीवारों पर सोना चढ़वाया था। ब्रिटिश सरकार ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जीत के लिए यहां अखंड पाठ करवाया था। अहमद शाह अब्दाली के सेनापति जहां खान ने इस मंदिर पर हमला किया था। सिख सेना ने इसके जवाब में उसकी पूरी सेना को खत्म कर दिया था। चारों दिशाओं से इस मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं क्योंकि चारों दिशाओं में इस मंदिर के प्रवेश द्वार बने हुए हैं। मंदिर में चार द्वार चारों धर्म की एकता के रूप में बनाए गए थे।

2.ताजमहल (Taj Mahal) Uttar Pradesh

प्यार की मिसाल माना जाने वाला दुनिया का यह अजूबा, भारत का गर्व है। इस अद्भुत स्मारक को सफ़ेद संगमरमर से शाहजहाँ द्वारा उसकी बेगम मुमताज़ की याद में बनवाया गया था। दुनिया का हर एक इंसान आज ताजमहल देखने की चाह रखता है क्योकि इसे मोहब्बत का मंदिर कहा जाता है। यमुना नदी के किनारे पर स्थित यह ईमारत एकविस्मरणीय स्थल है




1631 में, शाहजहाँ के साम्राज्य ने हर जगह अपना जीत का परचम लहराया था। उस समय की सभी बेगम में उनकी सबसे प्रिय थी। लेकिन पर्शियन बेगम मुमताज़ महल की मृत्यु अपने चौदहवे बच्चे को जन्म देते समय हो गयी, उनके चौदहवे बच्चे का नाम गौहर बेगम था। Taj Mahal का निर्माण मुग़ल सम्राट शाहजहाँ (शासनकाल 1628 से 1658) ने अपनी पत्नी मुमताज़ महल की याद में करवाया था, ताजमहल का निर्माण कार्य 1632 में शुरू हुआ।शाहजहाँ चाहते थे की दुनिया मुमताज़ और उनकी प्रेम कहानी को हमेशा याद रखे, इसीलिए उनकी याद में वे कुछ इतिहासिक धरोहर बनाना चाहते थे। जिसमे ताजमहल का निर्माण हुआ।ताजमहल भारत के आगरा शहर में यमुना नदी के तट पट स्थित एव विश्व धरोहर मकबरा है। ताजमहल में मकबरे और महेमानघर का भी समावेश है और साथ ही इसके दोनों और गार्डन्स भी है।

ताजमहल का निर्माण लगभग 1643 में ही ख़त्म हो गया था लेकिन फिर भी उसकी सुंदरता को बढ़ाने के लिये और 10 सालो तक काम किया गया। ताजमहल का निर्माण तक़रीबन 1653 में पूरा हो गया था और उस समय उसे बनाने में लगभग 32 मिलियन रुपयों का खर्चा लगा था, ताजमहल का निर्माण जानकारी के अनुसार 25000+ कारीगरों ने किया था। उस्ताद अहमद लाहौरी को प्रायः इसका प्रधान रूपांकनकर्ता माना जाता है।
सन 1983 में ताजमहल, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल बना। इसके साथ ही इसे विश्व धरोहर के सर्वत्र प्रशंसा पाने वाली, अत्युत्तम मानवी कृतियों में से एक बताया गया। ताजमहल को भारत की इस्लामी कला का रत्न भी घोषित किया गया। रबिन्द्रनाथ टैगोर ने अपने लेख, “दी टियर-ड्राप ऑन दी चीक ऑफ़ टाइम” में उस समय मुग़ल कालीन बहोत सी वस्तुकलाओ का वर्णन किया था, और भारतीय इतिहास की महान कृतियों को दुनिया के सामने रखा था।
3. सूर्य मंदिर (The Konark Sun Temple) Orissa
कोनार्क मंदिर व्यापक रूप से इसकी वास्तुशिल्प भव्यता के लिए नहीं बल्कि मूर्तिकला काम की जटिलता और प्रफेशन के लिए भी जाना जाता है। यह कलिंग वास्तुकला की उपलब्धि का सर्वोच्च बिंदु है, जिसमें अनुग्रह, आनंद और जीवन की लय को दर्शाया गया है, जिसमें सभी अद्भुत चमत्कार शामिल हैं।

कोणार्क मंदिर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में भी घोषणा किया गया है। इसका निर्माण 1250 एडी के दौरान पूर्वी गंगा के राजा नरसिम्हा देव प्रथम द्वारा करवाया गया था। कोनार्क सूर्य मंदिर के प्रत्येक तरफ 12 पहियों की दो पंक्तियां हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि मंदिर में स्थित चक्र दिन के 24 घंटों को दर्शाता है और कुछ लोगों का मानना है कि यह चक्र वर्ष के 12 महीनों को दर्शाता है।मोहम्मद गौरी के समय से ही ओडिशा पर कई मुस्लिम शहंशाओं ने आक्रमण किया परंतु हिंदू राजाओं ने हमेशा उन्हें पछाड़ा। हिंदू राजा जानते थे कि मुस्लिम राजाओं को ज्यादा दिन तक पीछे धकेलना आसान नहीं है तब भी उन्होंने दो शताब्दियों तक मुस्लिम शहंशाओं को पीछे धकेल कर रखा था।

13वीं शताब्दी के मध्य तक जब मुस्लिम शहंशाओं ने उत्तरी भारत पर कब्ज़ा किया और साथ ही बंगाल के कुछ प्रांतों को भी तभी नरसिम्हा देव प्रथम ने उनके खिलाफ आक्रमण किया। 1236एडी सुल्तान इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद दिल्ली की सल्तनत थोड़ी कमजोर पड़ गई। 1243 एड़ी, नरसिंह देव प्रथम और तूगान खान के बीचएक बहुत बड़ा युद्ध हुआ और उसमें नरसिंह देव की जीत हुई। इसी जीत की खुशी में वह एक मंदिर बनवाने मैं इच्छुक थे।
4. खजुराहो (Khajuraho Group Of Monuments) Madhya Pradesh
खजुराहो मध्य प्रदेश की एक बहुत ही प्रचलित जगह है. इसके इतने प्रचलित होने का कारण है, यहाँ के मंदिर. झाँसी से करीब 175 km दूर हिन्दुओं और जैन मंदिरों का समूह है, जो खजुराहो समूह के नाम से प्रचलित है 

अधिकतर खजुराहो के मंदिरों का निर्माण वर्ष 950 और 1050 में चंदेला साम्राज्य में हुआ था. इतिहासकारों के अनुसार 12वीं शताब्दी में करीब 85 मंदिर थे और करीब 20 km वर्ग के दायरे में फैले हुए थे. परन्तु प्राकृतिक आपदाओं के कारण अब केवल 20 मंदिर ही बचे हैं और कुल 6 km तक ही फैले हुए हैं. इन सभी मंदिरों में से कंदरिया मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध है

अकल्पनीय शिल्पकला और कामोत्तेजक मूर्तिकला होने के साथ सभी के मन में एक प्रश्न है की आखिर ऐसी मूर्तियाँ किसने और क्यों बनायीं हैं. कुछ विद्वानों का मानना है कि यह कामोत्तेजक मूर्तियाँ या कामुक कला हिन्दू परंपरा का ही भाग है जो मनुष्य के लिए जरुरी है. तथा कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राचीन काल में यहाँ पर कामुकता का अभ्यास हुआ करता था.
खजुराहो के मंदिरों की ख़ास बात यह है कि इन मूर्तिओं के द्वारा जो कामुक कला के आसन यहाँ दर्शाए गए हैं. स्त्री और पुरुषों की मूर्तिओं के मुख पर एक अलौकिक आनंद दिखाई देता है, और उनको देखकर किसी प्रकार की अश्लीलता का भाव नहीं आता. देखने में यह मंदिर और इनी शिल्पकला और कामोत्तेजक मूर्ती कला इतनी भव्य और प्रभावशाली है कि खजुराहो का मंदिर को विश्व धरोहर में शामिल किया गया है.
5. नालंदा विश्वविद्यालय (The Nalanda University) Bihar
इस विश्वविद्यालय के निर्माण के विषय में निश्चित जानकारी का अभाव है फिर भी गुप्त वंशी शासक  (414-455 ई.) ने इस बौद्ध संघ को पहला दान दिया था। ह्नेनसांग के अनुसार 470 ई. में गुप्त सम्राट नरसिंह गुप्त बालादित्य ने नालन्दा में एक सुन्दर मन्दिर निर्मित करवाकर इसमें 80 फुट ऊंची तांबे की बुद्ध प्रतिमा को स्थापित करवाया।
प्राचीन वैदिक प्रक्रिया को अपनाकर प्राचीन समय में बहुत सी शिक्षात्मक संस्थाओ की स्थापना की गयी थी, जैसे की तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जिन्हें भारत की प्राचीनतम यूनिवर्सिटी में गिना जाता है।5 वी और छठी शताब्दी में नालंदा गुप्त साम्राज्य के शासनकाल में निखरकर सामने आयी और बाद में हर्ष और कन्नौज साम्राज्य में भी इसका उल्लेख हमें दिखायी देता है। इसके बाद वाले समय में भारत के पूर्वी भाग में पाल साम्राज्य में बुद्ध धर्म का तेजी से विकास होता गया।शिखर पर होते हुए, यह स्कूल बहुत से विद्वानों और विद्यार्थियों को आकर्षित करती थी और इसके साथ ही तिब्बत, चाइना, कोरिया और मध्य एशिया से भी लोग यहाँ पढने के लिये आते थे। आर्कियोलॉजिकल तथ्यों से यह भी पता चला की इसका संबंध इंडोनेशिया के शैलेन्द्र साम्राज्य से भी था, जिसके एक राजा ने कॉम्प्लेक्स में एक मठ का निर्माण भी करवाया था।


पहले नालंदा एक समृद्ध गाँव था और साथ ही पास ही के शहर राजगृह (वर्तमान राजगीर) का व्यापार मार्ग भी था, राजगृह उस समय मगध की राजधानी हुआ करता था। कहा जाता है की जैन तीर्थकार महावीर ने 14 बरसात के मौसं नालंदा में बिताये थे। इसके साथ-साथ भी यहाँ आम के कुंज के पास प्रवचन देते थे। कहा जाता है की महावीर और बुद्धा तक़रीबन 5-6 वी शताब्दी के बीच गाँव में आये थे।लेकिन आज भी नालंदा के बारे में पर्याप्त और पूरी जानकारी उपलब्ध नही है। 17 वी शताब्दी के तिब्बतन लामा, तारनाथ ने बताया था तीसरी शताब्दी में BCE और बौद्ध सम्राट अशोक ने नालंदा में एक विशाल मंदिर का निर्माण शरिपुत्र चैत्य पर करवाया था। इसके साथ ही उनके अनुसात तीसरी शताब्दी में उनके बहुत से शिष्य जैसे आर्यदेव, भी नालंदा आये थे।तारनाथ ने यह भी बताया की नागार्जुन के समकालीन सुविष्णु के 108 मंदिर भी यहाँ बनवाए गए थे। बौद्ध धर्म के लोगो के लिये नालंदा किसी पवित्र स्थान से कम नही। लेकिन तीसरी शताब्दी से पहले नालंदा और बौद्ध धर्म के आपसी संबंधो को लेकर कोई इतिहासिक सबुत नही है।
6. हम्पी (The Hampi Temple Complex) Karnataka

 हम्पी भारत के उत्तरी कर्नाटक में स्थित है। अपने समय में यह दुनिया के सबसे विशाल और समृद्ध गाँवों में से एक था। यह विजयनगर शहर के खंडहरों में ही स्थित है, और यह जगह अपने ज़माने में विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी।हम्पी धर्म के लोग भी विजयनगर में ही रहते थे और उन्होंने अपने साम्राज्य में विरूपाक्ष मंदिर और बहुत से इतिहासिक स्मारकों का निर्माण भी किया था।

2014 के सांख्यिकी आँकड़ो के अनुसार, हम्पी गूगल पर खोजी जाने वाली कर्नाटक की सबसे प्रसिद्ध जगह है। हम्पिर साम्राज्य का सैन्य बल काफी मजबूत था जिनमे तक़रीबन 2 मिलियन पुरुष थे।1500 AD के आस-पास विजयनगर में तक़रीबन 5,00,000 निवासी रहने लगे थे, और उस समय यह बीजिंग के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शहर था और यह पेरिस की तुलना में कुल 3 गुना बड़ा है।
विजयनगर के राजा के कुछ समय पहले ही, उनका क्षेत्र कम्पिली के प्रमुखों के हाथो में चला गया था, जो अभी एक छोटा गाँव है, और हम्पी से 19 किलोमीटर की दुरी पर स्थित है।कहा जाता है की कम्पिली की स्थापना अन्नर बाड़ा के गायत्री गिरी ने की थी। गायत्री गिरी, गिरी साम्राज्य की उत्तराधिकारिणी थी जिसने अपने राज्य की सुरक्षा के लिये अपनी एक विशाल सेना की निर्मिती कर रखी थी। गायत्री गिरी ने स्थानिक लोगो की आर्थिक स्थिति को सुधरने के लिये बहुत सी धनराशी दान भी की और हजारो गरीबो को दिन-दुखियो की सहायता वह करती थी।

गायत्री गिरी का सबसे बड़ा योगदान दक्षिण भारत में रहा है, जहाँ उन्होंने सार्वजानिक शौचालय और जानवरों के रहने के लिये घर बनाने की व्यवस्था की। जानवरों के शेड के खंडहर आज भी हमें रामेश्वरम और थंजवुर में देखने को मिलते है। कहा जाता है की गायत्री का मैसूर की रानी प्रेमला तापूनिया पर प्रेम था, लेकिन उनके इस प्रस्ताव को प्रेमला ने बर्खास्त कर दिया था और इससे गायत्री के दिल पर काफी गहरा असर पड़ा। इसके बाद प्रेमला ने हुमानावार्नाम के राजा सुरेशा पल्लवा से विवाह कर लिया था।
इस जगह का महत्त्व इतिहासिक और वास्तुकला दोनों रूप में है। यह जमीन पूरी तरह से विशाल पत्थरो से लाजमी है, जिसका उपयोग जैन देवताओ को बनाने के लिये किया गया था। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने भी इस जगह पर उत्खनन का काम कर कयी बहुमूल्य रत्न और पत्थर को खोज निकाला है। जिनमे कुछ मंदिर और इतिहासिक धरोहर भी शामिल है।
7.            (The Monolithic Gomateshwara Statue) Karnataka.
 प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ के दो पुत्र हुए भरत और बाहुबली। भरत के नाम पर ही इस देश का नाम भारत रखा गया था। चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता ऋषभदेव थे और उनके 100 भाइयों में से प्रमुख का नाम 'बाहुबली' था। ऋषभदेव के जंगल चले जाने के बाद राज्याधिकार के लिए बाहुबली और भरत में युद्ध हुआ। बाहुबली ने युद्ध में भरत को परास्त कर दिया।लेकिन इस घटना के बाद उनके मन में भी विरक्ति भाव जाग्रत हुआ और उन्होंने भरत को राजपाट ले लेने को कहा, तब वे खुद घोर तपश्चरण में लीन हो गए। तपस्या के पश्चात उनको केवल ज्ञान प्राप्त हुआ। भरत ने बाहुबली के सम्मान में पोदनपुर में 525 धनुष की बाहुबली की मूर्ति प्रतिष्ठित की। प्रथम सबसे विशाल प्रतिमा का यह उल्लेख है।

भारतीय राज्य के मड्या जिले में श्रवणबेलगोला के गोम्मटेश्वर स्थान पर प्राचीन जैन तीर्थस्थल स्थित है। यहां पर भगवान बाहुबली की विशालकाय प्रतिमा स्थापित है, जो पूर्णत: एक ही पत्थर से निर्मित है। इस मूर्ति को बनाने में मूर्तिकार को लगभग 12 वर्ष लगे। बाहुबली को गोमटेश्वर भी कहा जाता था।

श्रवणबेलगोला में गोम्मटेश्वर द्वार के बाईं ओर एक पाषाण पर शक सं. 1102 का एक लेख कानड़ी भाषा में है। इसके अनुसार ऋषभ के दो पुत्र भरत और बाहुबली थे। ऋषभदेव के जंगल चले जाने के बाद राज्याधिकार के लिए बाहुबली और भरत में युद्ध हुआ। बाहुबली ने युद्ध में भरत को परास्त कर दिया। लेकिन इस घटना के बाद उनके मन में भी विरक्ति भाव जाग्रत हुआ और उन्होंने भरत को राजपाट ले लेने को कहा, तब वे खुद घोर तपश्चरण में लीन हो गए। तपस्या के पश्चात उनको यहीं पर केवल ज्ञान प्राप्त हुआ

कालांतर में मूर्ति के आस-पास का प्रदेश वन कुक्कुटों तथा सर्पों से व्याप्त हो गया जिससे लोग मूर्ति को ही कुक्कुटेश्वर कहने लगे। भयानक जंगल होने के कारण यहां कोई पहुंच नहीं पाता था इसलिए यह मूर्ति लोगों
की स्मृति से लुप्त हो गई।
गंग वंशीय रायमल्ल के मंत्री चामुंडा राय ने इस मूर्ति का वृत्तांत सुनकर इसके दर्शन करने चाहे, किंतु पोदनपुर की यात्रा कठिन समझकर श्रवणबेलगोला में उन्होंने पोदनपुर की मूर्ति के अनुरूप ही गोम्मटेश्वर की मूर्ति का निर्माण करवाया। गोम्मटेश्वर की मूर्ति संसार की विशालतम मूर्तियों में से एक मानी जाती है





No comments:

Post a Comment